Tuesday, 3 January 2017

मरते दम तक...!

कुछ ऐसे फ़ैसले बता दीये
तो ये फासले बन गये।
जाने क्यू ज़िंदगी के हर
राहपर ये काफिले बन गये।

सच झूठ से कडवा होता हैं
हम उसे क्यू दबाये रखते हैं।
खुदको चोट ना पहुँचे इसलिए
साँसें घूँट घूँट के मरते हैं।

दिलसें समजने वाले मिलते नहीं
रोते हैं जो उन्हें और रूलाते हैं।
एक आहट प्यार की कभी देते नहीं
ठोकर खाने वाले को और ठुकराते हैं।

समजो थोड़ासा हमें ए दोस्तों
देखो हमें दिल की गहराई से।
पहचानो मत कभी हमें भिड़ में
मिले कभी अकेले देखो नरमाई से।

मिला जो ज़िंदगी से हमे
उसे सहलेगें अंतिम साँस तक।
ना बाटेंगें दुख अपना किसीसे
सहलेंगें अकेले मरते दम तक।

          कवि गजानन कचरू काले
              मो : 9623714011

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